Thursday, March 7, 2013

Virodh

कभी धूप घनी स्वर्णिम कभी अजब काली छाया
मैं खुद को आज तक क्यों समझ नहीं पाया

अथाह दुःख में गोते, अपार हर्ष भी आया
कभी दे दिया बहुत कुछ, कभी रस्ते से लेकर आया

कभी खोने की सीमा न रही, कभी अत्यंत वैभव पाया
कभी भीड़ का नेतृत्व, कभी खुद को ना संभाल पाया

कभी हँसते हँसते रोया, रोने पे हँसना आया
कई ज़िंदगियाँ बनादी, कभी खुद को ना जीना आया

विश्वास के प्रजाल में विराट धोखा खाया
अगाध प्रेम की लहर से मन-पग को धोकर आया

सफलता मिली अपार कभी, कभी असफल लौट के आया
फिर सूरज की किरणों को मन में उतार लाया

पर हर बार मन की चंचलता को गौर से देखा तो पाया
कि मैं खुद को आज तक क्यों समझ नहीं पाया ______!!!

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