इज़हार ना कर सके पर हम ये सोचते थे कि जिन्हें खुद इश्क की पनाह हो
इज़हार-ए-इश्क की उनको कभी ज़रुरत नहीं होती
ग़मो के दौर में जिनके साया रहते हैं हम
ख़ुशी के पलो में उनको हमारी ही हसरत नहीं होती
ना जाते उस रोज़ जन्नत न मिलती उनसे नज़रे
या ख़ुदा उनके दीदार की फिर हमे चाहत नहीं होती
मासूम दिलकश अदाओं पे हम बन गए दीवाने
सोचा था यहाँ कभी बनावट नहीं होती
ख्वाबों से बसते थे "मान" कभी जिनके आशियाँ
सुना हैं आज कल वह कोई सजावट नहीं होती
जो उसने ठान ली मुझसे रूठ जाने की
तो दिल पे किसी के किसी और की हुकूमत नहीं होती
दुआ हैं उस परवरदिगार से तेरी सलामती की
कि दिल तोड़ने वालों को हासिल कभी जन्नत नहीं होती________!!!
इज़हार-ए-इश्क की उनको कभी ज़रुरत नहीं होती
ग़मो के दौर में जिनके साया रहते हैं हम
ख़ुशी के पलो में उनको हमारी ही हसरत नहीं होती
ना जाते उस रोज़ जन्नत न मिलती उनसे नज़रे
या ख़ुदा उनके दीदार की फिर हमे चाहत नहीं होती
मासूम दिलकश अदाओं पे हम बन गए दीवाने
सोचा था यहाँ कभी बनावट नहीं होती
ख्वाबों से बसते थे "मान" कभी जिनके आशियाँ
सुना हैं आज कल वह कोई सजावट नहीं होती
जो उसने ठान ली मुझसे रूठ जाने की
तो दिल पे किसी के किसी और की हुकूमत नहीं होती
दुआ हैं उस परवरदिगार से तेरी सलामती की
कि दिल तोड़ने वालों को हासिल कभी जन्नत नहीं होती________!!!
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