Tuesday, December 14, 2010

saakshatkar

किसी कवी ने कविता लिखी , कविता अत्यंत लोकप्रिय हुई
घर पहुंचे अनेको पत्रकार लेने उनका साक्षात्कार

दुर्भाग्य से कवि घर पर नहीं थे , पत्रकार इंतज़ार कर रहे थे
फिर अंदर से एक सन्देश आया कविवर लेने गए थे कार

वे न लौटे हो गयी शाम , हुए पत्रकार अत्यंत हताश
ये सोच कर की कल फिर आयेंगे , साक्षात्कार तो ले ही जायेंगे
पत्रकार सभी लौट गए लेकर मन में ऐसी आस

यहाँ कवि महोदय अपने जीवन के ख़ास लम्हों को भूना रहे थे
हर रोज़ नयी संगोष्ठी में अपनी कविताये सुना रहे थे

जिस दिन उनके दिल ने फिर अपने कवि मन में गोते लगाये
अपने कुटीर में उस दिन कविवर दौड़े दौड़े चले आये

आज पत्रकारों के चेहरे  पर जो आशा की थी आभा 
शायद ऐसी चमक को मैंने  कहीं ना था भांपा

सदियों से दफ़न जो होती है हर एक के मन में अभिलाषा
गर कोई तरकीब होती तो "श्रेयस"  तुमको  दिखलाता

खैर  हमारी कोई पूछे गुण कोई मेरे गाता
तो शायद इस जग के मेले में कोई मैं करतब दिखलाता

हां हम इस बात को भूल साक्षात्कार पर चलते है
कवि वर के जवाब से आज रूबरू मिलते है

ज्यों ही कवि आसीन हुए , हुई प्रश्नों की बोछार
पद्य रूप में देते गए कवि उत्तर सोच विचार

प्रश्न जो सरे पूछ लिए सम्पन्न हुआ अब साक्षात्कार
सारे के सारे पत्रकार हुए अब जाने को तैयार

अंत में जो एक प्रश्न किया क्या आप कभी चलाएंगे सरकार
कविवर बच कर निकल लिए कह कर करना है विराम         

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