Thursday, December 16, 2010

Jaam

रस्ते पे हर ओर जाम बिखरे पड़े थे
हमने इक उठाया और पी के आ गए

बेवक्त हर ख्वाहिश को भी मिल गए थे जो मुकाम,
बस दीदार पे साहिब की सब भुला के आ गए

हर ख्वाहिश कब्रसार हुई उनके वास्ते , और वे करने बे-जुस्तजू हमको आ गए
ना कहा तो की नहीं उनकी जुस्तजू , और वे ज़माने भर में कहके हमको बेवफा गए

हद जन्नत में जाकर भी वो रह ना पाए
जहन्नुम में दाखिल "श्रेयस " जी के आ गए

पीने की लत को छोड़ चुके थे हम तो कभी से
आज क्यों बिखेर रस्ते में आप जाम आ गए

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