कि आज बैठे बैठे ये बात दिल से निकली
वो कौनसी घडी थी जब नज़र थी मेरी फिसली
क्यूँ जिंदा हूँ मैं अब तक ये सोच कर हैरान हूँ
इतने सितम पे भी ना क्यूँ जान मेरी निकली
तब तो मोहित हो गए हम देख कमरिया पतली
आज उसी को कोसते है वो रूप ऐसे बदली
मनमोहनी वो आकर्षिणी, क्या नाज़ और क्या नखरे थे
बस इन्ही सब बातों पर हम टुकड़े टुकड़े बिखरे थे
वो कौनसी घडी थी जब नज़र थी मेरी फिसली
क्यूँ जिंदा हूँ मैं अब तक ये सोच कर हैरान हूँ
इतने सितम पे भी ना क्यूँ जान मेरी निकली
तब तो मोहित हो गए हम देख कमरिया पतली
आज उसी को कोसते है वो रूप ऐसे बदली
मनमोहनी वो आकर्षिणी, क्या नाज़ और क्या नखरे थे
बस इन्ही सब बातों पर हम टुकड़े टुकड़े बिखरे थे
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