Thursday, December 16, 2010

Dhokha

मोज़े हवा से फूलो के चेहरे उतर गए
गुल हो गए चिराग घरोंदे बिखर गए.

पेड़ो को छोड़ कर उड़े उनका ज़िक्र क्या
पाले हुए भी गैर की छत पे उतर गए

यादों की रुत के आते ही सब हो गए हरे
हम तो समझ रहे थे सभी जख्म भर गए

जो हो सके तो अब के भी सागर को लौट आ
साहिल के सीप स्वाति की बूंदों से भर गए

एक एक से अब पूछते फिरते है ये "श्रेयस"
वो ख्वाब क्या हुए वो मनाज़िर किधर गए

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