लम्हों में मेरे कभी तू भी हुआ करता था
दिन थे कभी जब मैं भी जिया करता था
वो तेरे घर के बहार किसी मुलाक़ात की मुस्कान
जिसको सोच सोचकर मैं भी मुस्कुरा दिया करता था
और वो नुक्कड़ वाली दूध की दुकान
जहाँ कई दफे शाम को तेरा इंतज़ार किया करता था
वो रोज़ सबेरे तेरे लिए फूलों की दुकान से
एक खूबसूरत गुलाब लिया करता था
वो दिन दिन भर तेरे बारे में सोचना और फिर
अपने सारे काम इसी तरह खराब किया करता था
रात को सोने की सिर्फ कोशिश ही हो पाती थी
खुली आँखों से फिर भी तेरे दीदार किया करता था
मुश्किल था तेरा मेरा मिलना इस समाज की दहलीजों में
इस बात को जेहन में हर वक़्त लिए फिरता था
पर ये बात सच है कि तुझे पाने कि कोशिश हर लम्हा
हाँ हर एक पल यही कोशिश किया करता था
तुझसे मिलने को रहता था बेताब फिर भी न जाने क्यों
तेरे मिलने पर कहाँ पलके उठाके तेरा दीदार किया करता था
तेरे सिवा किसी और को ना देखने की कसम
उस उम्र में ली थी मैंने जिस उम्र को मैं खुद आशिकी का हक दिया करता था
कैसे याद है ये सब बातें तुझे "मान "
तब तो हर बात मैं भुला दिया करता था
दिन थे कभी जब मैं भी जिया करता था
वो तेरे घर के बहार किसी मुलाक़ात की मुस्कान
जिसको सोच सोचकर मैं भी मुस्कुरा दिया करता था
और वो नुक्कड़ वाली दूध की दुकान
जहाँ कई दफे शाम को तेरा इंतज़ार किया करता था
वो रोज़ सबेरे तेरे लिए फूलों की दुकान से
एक खूबसूरत गुलाब लिया करता था
वो दिन दिन भर तेरे बारे में सोचना और फिर
अपने सारे काम इसी तरह खराब किया करता था
रात को सोने की सिर्फ कोशिश ही हो पाती थी
खुली आँखों से फिर भी तेरे दीदार किया करता था
मुश्किल था तेरा मेरा मिलना इस समाज की दहलीजों में
इस बात को जेहन में हर वक़्त लिए फिरता था
पर ये बात सच है कि तुझे पाने कि कोशिश हर लम्हा
हाँ हर एक पल यही कोशिश किया करता था
तुझसे मिलने को रहता था बेताब फिर भी न जाने क्यों
तेरे मिलने पर कहाँ पलके उठाके तेरा दीदार किया करता था
तेरे सिवा किसी और को ना देखने की कसम
उस उम्र में ली थी मैंने जिस उम्र को मैं खुद आशिकी का हक दिया करता था
कैसे याद है ये सब बातें तुझे "मान "
तब तो हर बात मैं भुला दिया करता था
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